॥ अध्याय 2, श्लोक 44 की व्याख्या ॥

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ 2.44 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

जो लोग भोग-विलास और ऐश्वर्य में अत्यधिक आसक्त हैं और जिनकी बुद्धि उन दिखावटी वचनों (पिछले श्लोक में वर्णित) से हर ली गई है, ऐसे लोगों के मन में दृढ़ निश्चय वाली बुद्धि उत्पन्न नहीं होती और न ही वे परमात्मा के ध्यान (समाधि) में स्थिर हो पाते हैं।

विस्तार: कृष्ण समझा रहे हैं कि सफलता और शांति के लिए 'एकाग्रता' (Focus) क्यों नहीं मिल पाती। यदि हमारा मन केवल सुख-सुविधाओं और बाहरी दिखावे में उलझा रहेगा, तो वह कभी भी उच्च लक्ष्यों (जैसे सत्य या ईश्वर) के लिए दृढ़ संकल्प नहीं कर पाएगा। विचलित मन कभी भी गहराई से नहीं सोच सकता।

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