यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ 2.46 ॥
एक बहुत बड़े जलाशय (नदी या झील) के प्राप्त हो जाने पर, एक छोटे कुएँ के जल का जितना प्रयोजन (जरूरत) रह जाता है, वैसे ही जिसे परम सत्य का ज्ञान हो गया है, उसके लिए सभी वेदों का उतना ही महत्व रह जाता है।
विस्तार: यह एक सुंदर उदाहरण है। जब आपके पास पूरी नदी हो, तो आप प्यास बुझाने के लिए छोटे कुएँ पर निर्भर नहीं रहते। वैसे ही, जब व्यक्ति को सीधा आत्मज्ञान या परमात्मा का अनुभव हो जाता है, तो उसे छोटे-छोटे कर्मकाण्डों या सांसारिक नियमों की आवश्यकता नहीं रहती। वह सीधा सत्य से जुड़ जाता है।