॥ अध्याय 2, श्लोक 50 की व्याख्या ॥

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ 2.50 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

समबुद्धि से युक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है (अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है)। इसलिए तुम योग में लग जाओ; क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।

विस्तार: योगः कर्मसु कौशलम् का अर्थ है कि अपने कार्य को इस प्रकार करना कि वह बंधन न बने। जब आप IIT-Bombay जैसे बड़े लक्ष्य के लिए पढ़ते हैं, तो पूरी एकाग्रता और निस्वार्थ भाव से पढ़ना ही 'कौशल' (Skill) है। ऐसा करने से सफलता और असफलता का तनाव खत्म हो जाता है।

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