कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ 2.51 ॥
क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर, जन्म रूपी बंधन से मुक्त हो जाते हैं और परम पद (परमानंद) को प्राप्त करते हैं जो दुखों से रहित है।
विस्तार: यहाँ कृष्ण कर्मयोग का अंतिम परिणाम बता रहे हैं। जब हम फल की आसक्ति छोड़ देते हैं, तो हम मानसिक रूप से स्वतंत्र हो जाते हैं। यह स्वतंत्रता हमें जीवन के दुखों से ऊपर उठा देती है और एक ऐसी शांति प्रदान करती है जिसे कोई बाहरी परिस्थिति भंग नहीं कर सकती।