यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ 2.52 ॥
जिस समय तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, उस समय तुम जो कुछ सुना गया है और जो कुछ सुनना बाकी है (अर्थात सांसारिक सुखों की बातों) से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।
विस्तार: मोह का अर्थ है वह भ्रम जो हमें सच्चाई देखने से रोकता है। कृष्ण कह रहे हैं कि जब ज्ञान के प्रकाश से अर्जुन का भ्रम दूर होगा, तब उसे संसार की व्यर्थ की बातों और दिखावटी सुखों में कोई रुचि नहीं रहेगी। वह केवल परम सत्य को जानने के लिए उत्सुक होगा।