श्रीभगवानुवाच ।
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ 2.55 ॥
श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! जिस समय मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपनी आत्मा से ही अपनी आत्मा में संतुष्ट रहता है, उस समय वह 'स्थितप्रज्ञ' कहा जाता है।
विस्तार: यहाँ कृष्ण समझा रहे हैं कि बाहरी सुखों पर निर्भरता छोड़ना ही मानसिक स्थिरता की पहली सीढ़ी है। जब आपकी खुशी किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर नहीं होती, बल्कि आपके अपने भीतर से आती है, तब आप विचलित नहीं होते। IIT की तैयारी में भी, यदि आप अपनी मेहनत से संतुष्ट हैं, तो बाहरी शोर आपको परेशान नहीं करेगा।