॥ अध्याय 2, श्लोक 58 की व्याख्या ॥

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ 2.58 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

विस्तार: कृष्ण यहाँ कछुए (Tortoise) का बहुत प्रभावशाली उदाहरण देते हैं। जब खतरा आता है, कछुआ अपने अंगों को अपनी ढाल के पीछे छिपा लेता है। उसी तरह, एक बुद्धिमान व्यक्ति (जैसे एक समर्पित छात्र) मोबाइल, सोशल मीडिया या अन्य ध्यान भटकाने वाली चीजों से अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है ताकि वह अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सके।

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