विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ 2.59 ॥
इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) बनी रहती है। लेकिन परमात्मा का साक्षात्कार होने पर इसकी वह आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।
विस्तार: यह एक बहुत गहरी मनोवैज्ञानिक बात है। यदि हम किसी चीज को जबरदस्ती छोड़ते हैं, तो मन में उसकी इच्छा बनी रहती है। लेकिन जब हमें उससे कुछ 'बेहतर' या 'उच्च' प्राप्त हो जाता है, तो पुरानी चीजें अपने आप फीकी पड़ जाती हैं। जैसे ही आपको अपनी पढ़ाई में आनंद आने लगेगा, फालतू के मनोरंजन की इच्छा खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी।