न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ 2.6 ॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है—हम उन्हें जीतें या वे हमें जीत लें? जिन धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) को मारकर हम जीवित भी नहीं रहना चाहते, वे ही हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।
विस्तार: यहाँ अर्जुन की मानसिक असमंजस (Confusion) साफ़ दिखती है। वह न केवल युद्ध के परिणामों से डर रहे हैं, बल्कि जीत की इच्छा भी खो चुके हैं। उन्हें लगता है कि जीत हो या हार, दोनों ही स्थितियों में दुख ही मिलेगा।