॥ अध्याय 2, श्लोक 66 की व्याख्या ॥

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ 2.66 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

योगरहित (असंयमी) पुरुष में श्रेष्ठ बुद्धि नहीं होती और उसके मन में कर्तव्य की भावना भी नहीं होती। भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कैसे मिल सकता है?

विस्तार: कृष्ण सुख का एक लॉजिकल सीक्वेंस बता रहे हैं: एकाग्रता → श्रेष्ठ बुद्धि → कर्तव्य भावना → शांति → सुख। यदि मन शांत नहीं है, तो दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं (जैसे एक बड़ा पद या पैसा) भी आपको सुख नहीं दे सकतीं। IIT-Bombay के छात्र के रूप में, यह आपके लिए सीख है कि मानसिक शांति ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है।

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