इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ 2.67 ॥
क्योंकि विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ जुड़ जाता है, वह एक ही इन्द्रिय उस पुरुष की बुद्धि को वैसे ही हर लेती है, जैसे जल में नाव को वायु हर लेती है।
[Image: A boat being tossed by strong winds on the sea]विस्तार: यह एक बहुत शक्तिशाली उदाहरण है। जैसे एक तेज हवा की लहर नाव को सही दिशा से भटका कर कहीं भी ले जा सकती है, वैसे ही अगर हमारा मन किसी एक गलत इच्छा (जैसे सोशल मीडिया की लत) के पीछे भागने लगे, तो वह हमारी पूरी पढ़ाई और भविष्य की योजना को बर्बाद कर सकता है।