॥ अध्याय 2, श्लोक 70 की व्याख्या ॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ 2.70 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

जैसे चारों ओर से नदियों के जल से भरे जाने पर भी समुद्र विचलित नहीं होता और अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है, वैसे ही जिस मनुष्य में सभी इच्छाएँ बिना किसी विकार के समा जाती हैं, वही शांति प्राप्त करता है; इच्छाओं के पीछे भागने वाला नहीं।

[Image: The vast ocean remaining calm even as many rivers flow into it]

विस्तार: यह श्लोक व्यक्तित्व की गहराई (Depth of Character) को दर्शाता है। एक IIT-Bombay के छात्र के लिए इसका अर्थ है कि बाहर की दुनिया में चाहे कितनी भी हलचल या प्रलोभन (Distractions) हों, आपका मन समुद्र की तरह गहरा और स्थिर होना चाहिए। शांति उसे मिलती है जो इच्छाओं को खुद में समा लेता है, न कि उसे जो इच्छाओं का गुलाम बन जाता है।

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