विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमिधिगच्छति ॥ 2.71 ॥
जो मनुष्य समस्त इच्छाओं को त्यागकर, ममता रहित और अहंकार रहित होकर विचरण करता है, वही शांति प्राप्त करता है।
विस्तार: यहाँ शांति के तीन मुख्य शत्रु बताए गए हैं: इच्छा (Desire), ममता (Attachment) और अहंकार (Ego)। जब हम 'मैं' और 'मेरा' के भाव से ऊपर उठ जाते हैं, तब मन पर कोई बोझ नहीं रहता। सफलता मिलने पर अहंकार न करना और विफलता मिलने पर निराश न होना ही असली योग है।