एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ 2.72 ॥
हे पार्थ! यह परमात्मा को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति (ब्राह्मी स्थिति) है। इसे प्राप्त करके मनुष्य कभी मोहित नहीं होता। यदि कोई अंत समय में भी इस स्थिति में स्थित हो जाए, तो वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
विस्तार: 'सांख्य योग' नामक दूसरा अध्याय यहाँ समाप्त होता है। कृष्ण कहते हैं कि एक बार जब आप इस उच्च चेतना (High Consciousness) को प्राप्त कर लेते हैं, तो भ्रम आपका पीछा छोड़ देता है। यह स्थिति ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमानंद में विलीन हो जाता है।