सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ 3.10 ॥
सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर कहा कि— तुम इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला (कामधेनु के समान) हो।
विस्तार: 'यज्ञ' केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, यह सह-अस्तित्व का विज्ञान है। हम प्रकृति से लेते हैं, और बदले में अपना श्रेष्ठ कर्म उसे देते हैं। यह श्लोक बताता है कि प्रगति का एकमात्र रास्ता 'परस्पर सहयोग' (Contribution) है।