॥ अध्याय 3, श्लोक 11 ॥

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

तुम इस यज्ञ द्वारा देवताओं को पुष्ट करो और वे देवता तुम लोगों को पुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण (परम श्रेय) को प्राप्त हो जाओगे।

विस्तार: यहाँ 'देवता' प्रकृति की शक्तियों (Environment, Resources, Society) का प्रतीक हैं। जब आप अपनी ऊर्जा समाज को देते हैं, तो समाज और प्रकृति आपको सफलता और सुख देते हैं। यह Win-Win स्थिति का प्राचीन भारतीय दर्शन है।

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