अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ 3.14 ॥
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों (कर्तव्य कर्मों) से उत्पन्न होता है।
विस्तार: यह एक बहुत ही सुंदर 'इकोसिस्टम' की व्याख्या है। हमारे कर्तव्य कर्म (यज्ञ) ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखते हैं। एक छात्र के रूप में, आपकी सही ढंग से की गई पढ़ाई उस बड़े तंत्र का हिस्सा है जो समाज को भविष्य में 'अन्न' और 'सुख' प्रदान करेगा।