एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ 3.16 ॥
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाए हुए सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं चलता (अर्थात अपना कर्तव्य नहीं करता), वह इन्द्रियों के सुख में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।
विस्तार: यह एक कड़ी चेतावनी है। जो व्यक्ति समाज से सब कुछ लेता है (सुविधाएं, ज्ञान, भोजन) लेकिन बदले में अपना योगदान (कर्म) नहीं देता, वह इस सृष्टि चक्र को तोड़ता है। केवल इन्द्रिय सुख (जैसे आलस्य या मनोरंजन) में समय गंवाना जीवन की बर्बादी है।