नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ 3.18 ॥
उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है; तथा समस्त प्राणियों में भी इसका किसी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता।
विस्तार: ऐसा व्यक्ति Free है। वह इसलिए काम नहीं करता कि उसे कुछ पाना है, और न ही वह काम से भागता है। वह किसी भी प्राणी पर अपने स्वार्थ के लिए निर्भर नहीं होता। यह मानसिक स्वतंत्रता की उच्चतम अवस्था है।