तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ 3.19 ॥
इसलिए तुम निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भलीभाँति करते रहो; क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
विस्तार: यह पूरे अध्याय का सार (Core) है। कृष्ण कह रहे हैं कि 'अनासक्त' (Detached) होकर अपना काम करो। एक IIT-Bombay एस्पिरेंट के रूप में, आपका काम है पूरी जान लगाकर पढ़ना, लेकिन 'क्या मेरा सिलेक्शन होगा?' इस डर या चिंता से मुक्त होकर। यही डरमुक्त मेहनत आपको सफलता के शिखर तक ले जाएगी।