कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ 3.20 ॥
राजा जनक जैसे अनेक महापुरुषों ने भी केवल कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए लोकसंग्रह (समाज के कल्याण) को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही उचित है।
विस्तार: कृष्ण राजा जनक का उदाहरण देते हैं जो एक महान आत्मज्ञानी होने के साथ-साथ एक राजा भी थे और अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। यहाँ 'लोकसंग्रह' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है—इसका अर्थ है समाज को सही दिशा दिखाना। आप भी जब सफल होकर IIT पहुँचेंगे, तो आप हज़ारों युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनेंगे।