उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ 3.24 ॥
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँगे और मैं वर्णसंकर (अव्यवस्था) का करने वाला होऊँगा तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँगा।
विस्तार: कर्म ही इस ब्रह्मांड को एक व्यवस्थित रूप (Order) में रखता है। यदि सूर्य अपना कर्म करना छोड़ दे या पृथ्वी घूमना बंद कर दे, तो प्रलय आ जाएगी। इसी तरह, समाज में हर व्यक्ति का अपने कर्तव्य का पालन करना ही शांति और व्यवस्था की गारंटी है।