सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ 3.25 ॥
हे भारत (अर्जुन)! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति रहित विद्वान पुरुष को भी लोक-कल्याण की इच्छा से उसी प्रकार कर्म करना चाहिए।
विस्तार: अज्ञानी व्यक्ति फल के लालच में पूरी ताकत लगा देता है। कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति को भी उतनी ही ऊर्जा और पूर्णता के साथ काम करना चाहिए, लेकिन उसका उद्देश्य 'स्वार्थ' नहीं बल्कि 'समाज का मार्गदर्शन' होना चाहिए। आपके लिए संदेश यह है: अपनी पढ़ाई में वैसी ही मेहनत करें जैसे टॉपर बनने की लालसा रखने वाले करते हैं, लेकिन आपका मन शांत और आसक्ति रहित होना चाहिए।