न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ 3.26 ॥
विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि में भ्रम (अर्थात कर्मों के प्रति अरुचि) पैदा न करे, बल्कि स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित होकर और उत्तम रीति से कर्म करता हुआ उनसे भी वैसा ही कराए।
विस्तार: एक सच्चा लीडर दूसरों को यह कहकर हतोत्साहित नहीं करता कि सब मोह-माया है, काम छोड़ दो। बल्कि वह खुद काम करके दूसरों को प्रेरित करता है। यह आपके लिए 'Team Work' और 'Peer Learning' में बहुत काम आएगा।