प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ 3.27 ॥
वास्तव में समस्त कर्म प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला अज्ञानी पुरुष मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है।
विस्तार: यह मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत गहरा है। हमारा शरीर, मस्तिष्क और परिस्थितियाँ प्रकृति के अधीन हैं। जब हमें सफलता मिलती है, तो हम 'अहंकार' में डूब जाते हैं कि यह मैंने किया है। यही अहंकार तनाव और पतन का कारण बनता है। सफलता को प्रकृति का उपहार मानकर विनम्र बने रहना ही बुद्धिमानी है।