॥ अध्याय 3, श्लोक 31 ॥

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ 3.31 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

जो मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरे इस मत (उपदेश) का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

विस्तार: यहाँ कृष्ण अपने दर्शन पर 'विश्वास' (Trust) करने की बात कर रहे हैं। यदि आप निष्काम कर्म के इस विज्ञान पर भरोसा करके अपना जीवन जीते हैं, तो परिणाम चाहे जो भी हो, आप कभी दुखी या बंधे हुए महसूस नहीं करेंगे।

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