इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ 3.34 ॥
इन्द्रियों के विषयों (जैसे स्वाद, दृश्य, शब्द) में राग (लगाव) और द्वेष (अरुचि) छिपे रहते हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही उसके कल्याण मार्ग में शत्रु हैं।
विस्तार: पढ़ाई के दौरान कई चीजें अच्छी लगती हैं (मनोरंजन) और कई बुरी (कठिन टॉपिक्स)। कृष्ण कहते हैं कि इन भावनाओं के वश में मत आओ। यदि आप केवल वही पढ़ेंगे जो 'अच्छा' लगता है, तो आप पूरा सिलेबस कभी खत्म नहीं कर पाएंगे। 'पसंद' और 'नापसंद' से ऊपर उठकर कर्तव्य करना ही असली जीत है।