॥ अध्याय 3, श्लोक 41 ॥

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ 3.41 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी 'काम' (इच्छा) को निश्चय ही मार डालो।

विस्तार: कृष्ण सबसे पहले इन्द्रियों (Senses) को अनुशासित करने की सलाह देते हैं। यदि इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, तो वे आपकी बुद्धि को भ्रमित कर देंगी। आपके लिए इसका अर्थ है—सोशल मीडिया, व्यर्थ की गप्पें और आलस्य जैसी इन्द्रिय-सुख की चीजों पर सबसे पहले लगाम लगाना।

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