न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ 3.5 ॥
निश्चित रूप से कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; क्योंकि प्रत्येक मनुष्य प्रकृति से उत्पन्न गुणों (सत्व, रज, तम) द्वारा विवश होकर कर्म करने के लिए बाध्य है।
विस्तार: यह एक वैज्ञानिक सत्य है। आपका शरीर और मन हमेशा क्रियाशील रहता है (यहाँ तक कि सोते समय भी)। कृष्ण समझा रहे हैं कि जब कर्म करना ही है, तो उसे 'सही दिशा' और 'सही चेतना' के साथ क्यों न किया जाए? आप अपनी प्रकृति को बदल नहीं सकते, लेकिन उसे शुद्ध कर सकते हैं।