कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ 3.6 ॥
जो मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर आदि) को तो हठपूर्वक ऊपर से रोकता है, परन्तु मन से इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह 'मिथ्याचारी' (ढोंगी या पाखंडी) कहलाता है।
विस्तार: कृष्ण यहाँ दिखावे की भक्ति या पढ़ाई के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं। यदि आप किताब खोलकर बैठे हैं लेकिन मन में कुछ और चल रहा है, तो वह 'पढ़ाई' नहीं बल्कि 'मिथ्याचार' है। असली अनुशासन बाहरी नहीं, आंतरिक होना चाहिए।