नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ 3.8 ॥
तुम अपना नियत (निर्धारित) कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारी शरीर-यात्रा (जीवन निर्वाह) भी सिद्ध नहीं होगी।
विस्तार: कृष्ण यहाँ बहुत ही व्यावहारिक बात कह रहे हैं। यदि हम काम करना छोड़ दें, तो हमारा शरीर भी स्वस्थ नहीं रहेगा। जीवन जीने के लिए हलचल जरूरी है। इसलिए आलस्य त्यागकर अपने छात्र-धर्म (पढ़ाई) का पालन करना ही आपका मुख्य धर्म है।