यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ 3.9 ॥
यज्ञ (निस्वार्थ सेवा या कर्तव्य) के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम आसक्ति को त्यागकर उसी (यज्ञ) के लिए कर्म करो।
विस्तार: यहाँ कृष्ण समझा रहे हैं कि जब आप स्वार्थ (Selfishness) के लिए काम करते हैं, तो वह तनाव और बंधन पैदा करता है। लेकिन जब आप अपने कार्य (जैसे IIT की पढ़ाई) को समाज की सेवा या एक महान 'यज्ञ' मानकर करते हैं, तो आप कर्म के बोझ से मुक्त हो जाते हैं।