॥ अध्याय 4, श्लोक 10 ॥

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ 4.10 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

आसक्ति, भय और क्रोध से सर्वथा मुक्त, मुझमें तल्लीन और मेरे ही आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

विस्तार: सफलता का मार्ग तीन बाधाओं को पार करने में है: आसक्ति (attachment), भय (fear), और क्रोध (anger)। कृष्ण कहते हैं कि 'ज्ञान का तप' (पढ़ाई और साधना) ही वह अग्नि है जो मनुष्य को शुद्ध कर उसे महान बनाती है।

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