चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ 4.13 ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभाग के अनुसार मेरे द्वारा रचा गया है। उसका कर्ता होने पर भी मुझे वास्तव में अकर्ता ही जान।
विस्तार: यह सबसे गलत समझा जाने वाला श्लोक है। कृष्ण स्पष्ट कह रहे हैं कि समाज का विभाजन 'जन्म' के आधार पर नहीं, बल्कि 'गुण' (Tendencies) और 'कर्म' (Aptitude) के आधार पर है। यदि आपकी बुद्धि रिसर्च और ज्ञान में है, तो आप 'ब्राह्मण' स्वभाव के हैं; यदि प्रबंधन और रक्षा में है, तो 'क्षत्रिय'। [Your Dream] की चयन प्रक्रिया भी इसी 'गुण-कर्म' पर आधारित है, न कि जन्म पर।