किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ 4.16 ॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म तत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ (संसार के बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
विस्तार: अक्सर हम हाथ-पैर हिलाने को 'काम' और चुप बैठने को 'आलस्य' समझ लेते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यह इतना सरल नहीं है। असली कर्म वह है जो अंतरात्मा से जुड़ा हो। IIT की तैयारी में भी, केवल किताबें खोलकर बैठना 'कर्म' नहीं है, बल्कि एकाग्रता के साथ विषय को आत्मसात करना असली कर्म है।