कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ 4.17 ॥
कर्म का स्वरूप भी समझना चाहिए, 'विकर्म' (निषिद्ध कर्म) का स्वरूप भी समझना चाहिए और 'अकर्म' का स्वरूप भी समझना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (गहन) है।
विस्तार: 1. कर्म: कर्तव्य पालन। 2. विकर्म: गलत या हानिकारक कार्य। 3. अकर्म: वह कार्य जो बिना फल की इच्छा के किया जाए (जो बंधन पैदा न करे)। इन तीनों के बीच का अंतर समझना एक सफल और शांत जीवन के लिए अनिवार्य है।