यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ 4.22 ॥
जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया है और जो सुख-दुख, हार-जीत जैसे द्वंद्वों से अतीत हो गया है—ऐसा पुरुष सफलता और असफलता में समान रहकर कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता।
विस्तार: 'विमत्सरः' (ईर्ष्या रहित) होना एक छात्र के लिए बहुत जरूरी है। दूसरों के मार्क्स या प्रगति से जलने के बजाय अपनी मेहनत पर ध्यान देना ही सच्ची योग स्थिति है। IIT की तैयारी में मॉक टेस्ट में कभी नंबर अच्छे आएंगे, कभी खराब; दोनों स्थितियों में 'समान' रहना ही आपको मुख्य परीक्षा के लिए तैयार करेगा।