ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ 4.24 ॥
जिस यज्ञ में अर्पण (स्रुवा आदि) भी ब्रह्म है, हवि (आहुति) भी ब्रह्म है, अग्नि भी ब्रह्म है और हवन करने वाला भी ब्रह्म ही है—ऐसे ब्रह्म-कर्म में स्थित रहने वाले पुरुष द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही होता है।
विस्तार: यह अद्वैत दर्शन का शिखर है। जब आप पढ़ रहे हों, तो यह महसूस करें कि आपकी 'बुद्धि' ब्रह्म है, 'किताब' ब्रह्म है, 'मेहनत' ब्रह्म है और 'लक्ष्य' (IIT) भी ब्रह्म ही है। जब सब कुछ एक ही विराट शक्ति का हिस्सा लगने लगता है, तो भय और चिंता मिट जाते हैं।