दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ 4.25 ॥
दूसरे योगीजन देवताओं के पूजन रूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान करते हैं और अन्य योगीजन परमात्मा रूप अग्नि में 'अभेद दर्शन' रूप यज्ञ द्वारा ही आत्मा का हवन करते हैं।
विस्तार: यहाँ से कृष्ण 'यज्ञ' के विभिन्न रूपों का वर्णन शुरू करते हैं। कोई भक्ति के द्वारा सेवा करता है, तो कोई ज्ञान के द्वारा। हर व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार अपना मार्ग चुन सकता है।