॥ अध्याय 4, श्लोक 26 ॥

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ 4.26 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

अन्य योगीजन कान आदि समस्त इंद्रियों को 'संयम' रूपी अग्नि में हवन करते हैं और दूसरे योगीजन शब्दादि विषयों को इंद्रियों रूपी अग्नि में हवन करते हैं।

विस्तार: यहाँ कृष्ण दो तरह के अनुशासन बता रहे हैं। पहला—बाहरी उत्तेजनाओं से इंद्रियों को हटाना (जैसे पढ़ाई के वक्त फोन साइलेंट करना)। दूसरा—इंद्रियों का उपयोग केवल आवश्यक ज्ञान के लिए करना। यह 'Information Overload' के दौर में आपके फोकस के लिए बहुत जरूरी है।

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