॥ अध्याय 4, श्लोक 28 ॥

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ 4.28 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

कितने ही पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा कितने ही योग रूप यज्ञ करने वाले हैं। कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्याय रूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।

विस्तार: कृष्ण यहाँ 'स्वाध्याय' (Self-study) को भी एक यज्ञ कह रहे हैं। यदि आप अपनी किताबों को पूरी लगन से पढ़ रहे हैं, तो आप वास्तव में एक 'ज्ञानयज्ञ' कर रहे हैं। यह श्लोक बताता है कि हर व्यक्ति की मेहनत का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन निष्ठा समान होनी चाहिए।

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