॥ अध्याय 4, श्लोक 31 ॥

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ 4.31 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे होगा?

विस्तार: 'यज्ञ' का अर्थ है निस्वार्थ कर्म। जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। आपकी [Your Dream] की तैयारी भी एक यज्ञ है—यदि आप इसे केवल बोझ मानेंगे, तो वर्तमान भी खराब होगा। यदि इसे 'ज्ञान का अमृत' मानकर करेंगे, तो सफलता और शांति दोनों मिलेंगी।

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