अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ 4.40 ॥
विवेकहीन, श्रद्धाहीन और संशययुक्त (Doubtful) मनुष्य का पतन हो जाता है। संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न ही सुख है।
विस्तार: संशयात्मा विनश्यति—यह एक चेतावनी है। यदि आप अपनी क्षमता पर, अपने लक्ष्य पर या अपने मार्ग पर हमेशा शक करेंगे, तो आप कभी सफल नहीं हो पाएंगे। संशय आपकी ऊर्जा को सोख लेता है। सवाल पूछना अच्छा है, लेकिन खुद की काबिलियत पर 'संदेह' करना घातक है।