॥ अध्याय 4, श्लोक 8 ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 4.8 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

सज्जन पुरुषों के उद्धार के लिए, पापकर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की भलीभाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

विस्तार: कृष्ण यहाँ 'Mission Statement' दे रहे हैं। सज्जनता की रक्षा और बुराई का अंत ही प्रगति का आधार है। एक विद्यार्थी के रूप में, आपके भीतर के 'साधु' (एकाग्रता, अनुशासन) की रक्षा करना और 'दुष्कृत' (आलस्य, भटकाव) का विनाश करना ही आपका धर्म है।

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