ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ 5.10 ॥
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता।
विस्तार: यह बहुत सुंदर उदाहरण है। कमल का पत्ता पानी में ही रहता है, लेकिन पानी उसे गीला नहीं कर पाता। उसी तरह आप इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में रहें, [Your Dream] के लिए दिन-रात एक करें, लेकिन तनाव और ईर्ष्या को खुद पर टिकने न दें।