कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ 5.11 ॥
कर्मयोगी केवल इंद्रियों, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर 'अंतःकरण की शुद्धि' के लिए ही कर्म करते हैं।
विस्तार: जब आप अपनी पढ़ाई को केवल [Your Dream] पाने का साधन न मानकर, अपनी बुद्धि और एकाग्रता को तराशने का एक माध्यम मानते हैं, तो पढ़ाई बोझ नहीं लगती। यह नजरिया आपको 'रिजल्ट के डर' से मुक्त करता है।