युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ 5.12 ॥
कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और जो युक्त नहीं है, वह कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।
विस्तार: यहाँ कृष्ण दो तरह के लोगों की तुलना कर रहे हैं। एक जो 'काम' पर ध्यान देता है (शांति पाता है) और दूसरा जो 'नाम और इनाम' पर ध्यान देता है (तनाव में रहता है)। [Your Dream] तक पहुँचने का सबसे शांत रास्ता वही है जहाँ आप अपनी हर कोशिश को एक समर्पण बना दें।