सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ 5.13 ॥
जिसका अंतःकरण वश में है, ऐसा सांख्ययोगी सब कर्मों को मन से त्यागकर नौ द्वारों वाले शरीर रूपी घर में, न कुछ करता हुआ और न कुछ करवाता हुआ ही सुखपूर्वक बैठा रहता है।
विस्तार: यह शरीर एक घर की तरह है जिसमें 9 दरवाजे (2 आँखें, 2 कान, 2 नथुने, 1 मुख और 2 मल-मूत्र द्वार) हैं। ज्ञानी व्यक्ति यह समझता है कि वह इस शरीर के अंदर रहने वाला 'किरायेदार' (आत्मा) है, मालिक नहीं। यह बोध आपको शारीरिक थकान और मानसिक तनाव से ऊपर उठा देता है।