श्रीभगवानुवाच :
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ 5.2 ॥
श्रीभगवान बोले: कर्म संन्यास और कर्मयोग—ये दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं; परंतु उन दोनों में भी कर्म संन्यास की अपेक्षा 'कर्मयोग' (निष्काम भाव से कर्म करना) श्रेष्ठ है।
विस्तार: कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म छोड़ने से बेहतर है कर्म को सही भाव से करना। [Your Dream] के लिए केवल इच्छा करना संन्यास की एक नकल हो सकती है, लेकिन उस सपने के लिए मैदान में उतरकर मेहनत करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।