ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ 5.22 ॥
जो इंद्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे निश्चय ही दुख के ही कारण हैं। हे अर्जुन! वे आदि और अंत वाले (अनित्य) हैं, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति उनमें नहीं रमता।
विस्तार: यह एक विद्यार्थी के लिए बहुत बड़ा सत्य है। इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन (जैसे देर तक सोना या फालतू बातें करना) शुरू में सुख देते हैं, लेकिन बाद में अपराधबोध (Guilt) और असफलता का दुख लाते हैं। जो [Your Dream] के प्रति गंभीर है, वह इन क्षणिक सुखों के पीछे नहीं भागता।